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Tuesday, March 7, 2017

काश  मैं एक लड़का होती।

मैंने एक दुनिया बनायीं अपनी,
इस अनजान शहर में आकर भी, एक मुकाम, एक मकां बनाया
डर लगता हैं खो न जाए वो कही ,
काश  मैं एक लड़का होती।
अपना घर और बड़ा बनाती मैं,
अपनी दुल्हन इसी घर  में लाती मैं,
इस बसी बसाई घर गृहस्ती के साथ ही, नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करती मैं।

मगर एक लड़की हूँ मैं,
जैसा सब  कहते हैं, किसी और की अमानत हूँ मैं ,
क्या करुँगी अपनी इस दुनिया का ,
जब जाना होगा किसी और का घर बसाने ,
अपनी ज़िन्दगी को किसी और के नाम करने।

काश मैं एक लड़का होती,
तो मायूसी के बोझ तले , कभी ना दबना पड़ता ,
अपना घर , अपना संसार, तब अपना ही होता 
किसी को इसे, मुझसे छीनने  का हक़ न होता। 

आज ज़माना बदला हैं,
सब कहते तो हैं , 
हमारी सोच बदली हैं,
सब कहते तो हैं। 
मगर शादी करके दूसरे घर जाना होगा,
ये कब बदला हैं ,
अपने माँ-बाप को पराया कर, एक नए परिवार को अपनाना होगा,
ये कब बदला हैं। 

काश मैं लड़का होती,
तो ये सब ना लिख रही होती,
शादी के ख़याल से ही,
कभी खुश, कभी विचलित ना होती.. 

काश मैं लड़का होती।

Dedicated to all of us.. WOMEN... who live their lives, for someone else. 

Wednesday, August 24, 2016

I am different otherwise.....

I am different when u r around 
&
I am different otherwise

I am different in my comfort zone 
&
I am different otherwise

I am different when I dream 
&
I am different otherwise

I am different when I soak myself into the past 
&
I am different otherwise

I am quiet calm shy 
&
I am different otherwise

I am a party girl 
&
I am different otherwise

I might be a different 'me' sometime
But
I will be a different 'me' otherwise... 

So don't judge me that I am different at times..
Coz'
I might be different otherwise....

Wednesday, March 25, 2015

मंज़िल

क्या मंज़िल वो हैं जो मिल जाए
नहीं
क्या मंज़िल वो हैं जिसे हासिल किया जाए
हरगिज़ नहीं
जो मिलकर भी ना मिले, वो हैं मंज़िल
हर मंज़िल पर पहुंचकर, इक नया आगाज़ हैं मंज़िल
जो लगे बहुत करीब, पर इक मृगतृष्णा हैं मंज़िल
जिसे पाने के ख़्वाब लिए फिरते हैं, वो हैं मंज़िल

दरसल, इक ख़्वाब ही हैं मंज़िल

ना सच और ना गुमां हैं ये मंज़िल
हज़ार एहतमामों के बावजूद, लाहासिल हैं मंज़िल !!!!! 

Wednesday, July 23, 2014

आदत

भीड़ की आदत हो गयी
की अब तन्हाई याद नहीं

सच्ची झूठीं  मुस्कानों की आदत हो गयी
की अब अश्क तक याद नहीं

भागने की आदत हो गयी
की अब चलना याद नहीं

सख्त अंधेरो की आदत हो गयी
की अब शाम की रंगीनियत याद नहीं

काम की इतनी आदत हो गयी
की अब बेमतलब सी कोई बात याद नहीं

रातों को जागने की इतनी आदत हो गयी
की अब कोई सपना याद नहीं

ज़िन्दगी में इतनी नयी आदतें हो गयी
की अब पिछली कोई याद… याद नहीं

Tuesday, October 29, 2013

चेहरा

किसी घूँघट के पीछे कोई चेहरा
किन्हीं आँखों पर काजल का पहरा
ट्रेन की खिड़की पर हवा खाता कोई चेहरा 
अपने दाम को तरसता हर चेहरा!

किसी पर छपी गहरी वक़्त कि लकीरें
किसी पर चमकती शौंख जवानी
हर चेहरा कुछ कहता हैं
अलग-अलग भाव में बिकता हैं !

हर चेहरे के पीछे छुपा कोई और चेहरा
हर चेहरे पर सजा... जज़बातों का सहरा
चेहरो कि तो बड़ी भीड़ हैं यहाँ
.... अपना समझने वालो का बड़ा मोल हैं यहाँ !

कोई चौराहे पर सजता है… रातों में बिकता हैं
कोई ठेठ बना रहता हैं
इस ज़िन्दगी के बाज़ार में
हर चेहरा अपनी कीमत ..  अपनी पहचान आईने में तकता हैं !!!!

Thursday, May 23, 2013

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

ना  बादलों के पर्दों में हैं
ना सितारों की गर्द में हैं
ना दूर फलक पर हैं

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

कितनी बातें हैं सुननी 
कितनी बातें हैं सुनानी
मेरी-तेरी ज़िन्दगी की
दिन-दिन बदलती कहानी

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

अब तो काली घटाओं
संग खेलना बंद कर
तेरे आसमां  और
      मेरे सपनो पर बिखरे सैकड़ो सितारों की
मुझसे जी-भर के बात कर

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

ना नजारों में हैं
ना मज़ारो पर हैं 
ना मस्जिदों और दरबारों में हैं
खुदा भी तुझको ढूंढ़ रहा हैं

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

याद हैं ...
जब गर्म रातों में छत पर,
नींद के इंतज़ार में नर्म बिछौने पर
मुझसे बातें करता था ..
तारों की झिलमिल से, कभी बादलों की महफ़िल से
और कभी रात के सन्नाटों से भागता-फिरता था
इतनी  मशक्कत के बावजूद
मुझसे मिलने आता था !

भई चाँद तू हैं कहाँ ?

इस  बम्बई के आसमां पर
बता मैं तुझको ढूंढ़ु  कहाँ ?
इन इमारतों की ऊँचाईयों में,
बता मैं तुझको ढूंढ़ु  कहाँ ?
मचलती-ठहरती लहरों में,
बता मैं तुझको ढूंढ़ु  कहाँ ?

भई चाँद तू हैं कहाँ ? 
बता मैं तुझको ढूंढ़ु  कहाँ ?

Thursday, May 16, 2013

आदत प्याले की लग जाती
तो हालत बुरी हो जाती!

उससे से तो बच गया
तुझसे बचने को कहाँ भागु ?

प्याले तो छूट गए, तेरी आदत लगा गए
मैं अपनी आदतों से दूर कहाँ भागु?

दुनिया तुझमे सिमटी हैं अपनी
अपनी दुनिया से दूर कहाँ भागु ?

अब किसी रंगीन पानी की क्या ज़रूरत
तेरी आदते काफी हैं
तू ही मेरी रंगीनियत और हया हैं
ये रंगीनियत और हया छोड़ मैं कहाँ भागु ?
बता, मैं तुझसे दूर कहाँ भागु ?

Monday, May 13, 2013

माँ ...

तेरे आँचल में
ना धूप लगती थी, ना बरिशे !
जब से बाहर आया हूँ
छाँव ढूंढ़ रहा हूँ !


अंधेरो के सायो से
अब डर नहीं लगता

आसुओ को सुखाने में
रात बीत जाती हैं

साए मचलते रहते हैं
और आँख लग जाती हैं ! 

Thursday, May 9, 2013

कामयाबी, तेरा शहर...

जाने किन गलियों से चला था मैं
और, किस शहर को आ गया
मंजिले पाने की धुन में
रास्तो में उलझ गया
उलझनों से फिर रस्ते बुनकर
देखो, किस मुकाम पर पहुँच गया!

ऊंचाइयों पर रहना सीख गया
महफ़िलो में, कभी अकेले में
विदेशी हया पीना सीख गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं क्या-क्या सीख गया !

आज ज़िन्दगी आलिशान हैं
बंगले में बैठा हूँ
बाहर बागीचा-बाघबान हैं
'कामियाबी' तेरे शहर में
देख, आज मेरी क्या शान हैं !

झूठी मुस्काने लिए फिरता हूँ
कभी अश्कों को दबाये रहता हूँ
सच्चे-झूठे अफ़साने लिख-लिख कर
अपनी शोहरत बढ़ाता हूँ
दोस्त-दोस्त में फरक समझता हूँ
'कामयाबी' तेरे शहर में
देख, मैं कैसे-कैसे दिन बिताता हूँ

'कामयाबी' तेरे शहर में,
वक़्त हैं कही खो गया
वक़्त के साथ दौड़ लगाते
मैं भी कही गुम गया
वक़्त का रोना रोते-रोते
इक अरसा तक बीत गया! 

रोज़ आईने पर इतराता था जो ...
'कामयाबी' तेरे शहर में आकर,
वो अक्स मुझसे टूट गया !

तुम अपनी शक्ल की बात करते हो
हुज़ूर,
ये शख्स तो अपनी सूरत तक हैं भूल गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं कितना कुछ भूल गया  !!!

Friday, May 3, 2013

100 years

100 years of a magnificent magic on screen
100 years of rolling cameras
100 years of glittering lights
100 years of action

100 years of dreaming minds
100 years of creativity
100 years of struggle 
100 years of glamor

100 years of romance
100 years of emotions
100 years of relations
100 years of change

100 years of melody of playback
100 years of lurking aspirations
100 years of celluloid
100 years of glory
100 years of path breaking cinema
100 years of Indian Cinema...

May 3rd 2013 is marking the completion of 100 years of Indian Cinema, the biggest Industry throughout the world. This Industry is no doubt a source of inspiration and dreaming big for thousands around the Indian sub-continent.
Saluting the spirit of Indian Cinema...  the spirit of everyone who is a part of this ever growing Industry.




Wednesday, April 24, 2013

आज के रावण

बरसो से रावण के पुतले को
पटाखों से फोड़ते आये हैं 
रावण का क्रोध, पुतले पर उतार
सदियों से दशहरा मनाते आये हैं !

तब अयोध्या की साख की
आज कोई और कहानी हैं 

गुस्से की आग में
पुतले फूकने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !

माँ-बहन का नाम दिया
जिस नारी को
देवी की मूरत में पूजा किये
जिस नारी को 

अपवित्र कर दिया आँचल
उस नारी का
आबरू-बेआबरू कर सर झुकाया
उस नारी का 

अरमानो को उसके झकझोड़ दिया
ऐ मर्द ,
ममता भरा सीना उसका
जब तूने नोच दिया !

कलियुग की बिसाख पर
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं
बेशर्मो की मिसाल,
एक हमारी राजधानी हैं 

भभकती आग में
रोष जताने की,
चित-चित जलती चिंगारियों से,
उद्घोष अपना सुनाने की
अत्याचारियों का पुतला जलाने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !
कलियुग की बिसाख पर
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं!

आज वक़्त हैं,
मशालो में अपनी आग भर लो
मन में लावा-लहू भर लो
हर सीता के प्रतिशोध की
आज बारी आई हैं !
मर्दों के पुतले ख़ाक करने की
जीते-जागते रावणों का दशहरा मानाने की
आज बारी आई हैं....


Monday, April 15, 2013

इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में अब भी ताज़ा हैं
तेरे लब से निकली हर बात !

इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में तरो ताज़ा हैं
अपनी तकरारे, बेवक़्त बेबात !

इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में आज भी चुभता हैं
तेरा पलटना और वापस न आना!

तेरी आमद के इंतज़ार में
अश्क कितने बहा दिए
तेरे अफ़साने लिख-लिख कर
अदीबो ने,
लफ्ज़ कितने गंवा दिए!

बावजूद इसके...
महज़ अशरार न कहना इन्हें
मेरे लफ्ज़ जो गुमसुम हो जाएंगे
जिस कलम से उतर रहे हैं,
उसी स्याही में सूख जाएंगे !

जिन जज्बातों को उकेरने बैठी हूँ ,
वो मुझसे खफा हो जाएंगे !
हबीब बन मेरे साथ थे जो ,
वही, मेरे रकीब बन जाएंगे !

Saturday, April 6, 2013

सवाल-जवाब

हर दिन नए सवाल उमड़-उमड़ कर आ रहे हैं
ए ज़िन्दगी, हैं कोई जवाब तुम्हारे पास?

सवालों पर कुछ रहम तो खाओ
बेचारे, कतारों में खड़े पसीना बहा रहे हैं
और तुम, बेरहमो की तरह भाग रही हो?

अरे सुनो, ज़रा रुको, कुछ पल ठहर के देखो
महसूस तो कर के देखो खुद को
एहसासों की पनाह में चंद सांसे भर के देखो

जाने किन उलझनों में गुंथी पड़ी हो
किसी दिन, सुलझनो का स्वाद भी चख के देखो

जवाबो की कतारे अपने आप लग जाएँगी
सवालो को फिर चैन मिलेगा ..
और शायद मुझको भी ........

Sunday, March 31, 2013

अरमान

हजारो अरमान मन में घर बसा कर बैठे हैं

अपने को हकीकत में ढाल दे,
इसी इंतज़ार में ये तशरीफ़ सजा कर बैठे हैं

चुप्पी बन, जुबां पर अटके लफ्जों की मानिंद
ये मन की देहलीज़ पर डटके बैठे हैं

कितने हकीकत बन पाए
वो मन-ही-मन हिसाब कर लेते हैं

घर की बात घर में रखके

मुझे बहलाने को हर दिन एक नया अरमान
फिर बुला लेते है… 



Thursday, September 20, 2012

New Beginnings....:)

What all does an average student dream for?
A college with a good atmosphere and expert faculties; A degree of his/her choice plus a handsome placement offer and salary package....
Isn't it?
But when you actually pass out college and enter the Job life (the most desired one) you are face to face with the realities of life...Realities in terms of day-to-day struggles to rise an inch above others and above yourself as well, efficiently managing yourself as per the time, strive to be different etc..Your conscience poses certain questions in front of you like Am I at the right place?; Had I been dreaming of the same? and so on....Followed by this you start meeting your personal fears, of which one of the biggest fears is Loneliness; which can obviously be tragic if not dealt with in time. Other fears can be of the unknown and strange crowd (specially when you are at a place called the "Mumbai"), fear of strangers etc.

As I travel daily through the fully crowded local trains at Mumbai, usually standing at the corner of the footboard near the door or as I climb up the Borivali Skywalk...I ponder upon what has changed my life completely...
"Follow the path, your dreams take you..."
Ya so true and that's my mantra...
We continue to run in the Rat race completely disregarding what are actually our goals...And so we end up  with nothing.
Philosophies apart, lets come to the point...This is about sharing my personal experience with you....

 Being the only child of my parents, I have been nurtured and fondled by them for all twenty years of my life. Starting from getting up early in the morning, tea, tiffin, dinner, all my decisions and for everything else I have been dependent on them...But I suppose I kept on taking all that for granted; I suppose every child on the Earth does so. But time makes you realize your mistakes....

Time is cruel and harsh in this context.
(I hate you Mr. Time for being their)

Well that was the time I had to be back home before 8 pm, otherwise at least make a call declaring the exact time I would be reaching. (Else keep your excuses/ explanations, though one and the same, ready in the back of your mind ;) )
Still it was easy going....Mr.Time was supposingly lazy during those days....

One day the change has to come.

18th July 2012 I boarded the Avantika Express; the Indore-Mumbai daily train; and I left home...The new morning brought heaps of emotions, new beginnings, new city and a new life right under my feet.
The change was terrific...
I had to start from the beginning. May it be cooking, doing household chores, travelling and working all came to my part with a sudden pact. It made me Independent- financially, mentally and physically...free to make choices.
Free to move around, or to stay back at home; Free to stay out till late night or to still obey my parents words' and return till 8.30 p.m; free to do anything or to do everything that was good for me; free to spend my earnings at food stalls and shopping malls or to save it for buying a gift for my parents and cheer them as I get back for a couple of holidays.
Choices make all the difference....The world seems to be mine.
May be this is the story of every youngster who steps out to turn their dreams into a reality; or may be not; Choices make the difference.....
The anxiety of being alone at home or the excitement of strolling down at Marines with new acquaintances or with an old pal from hometown.

I wanted to share these bits of experiences, because I am already filled with so many of them. Actually being at home I have had the habit of sharing the days experiences with my Mom. But now suddenly, a thousand miles between me and my Mom and obviously between me and my Dad.
I can share these things with my roomies, if anyway they return before 11 or 11.30 pm (and its a rare case). These feelings and memories come out from time-to-time not as words, but as salted water creeping down through the corners of my eyes....

But now it has been almost two months I am here and I am learning the new life...I have nothing pre-planned...I take life as it unfolds- dealing with all its positives and negatives.
I am trying to make it and I am sure will be successful...

And that is all....

Thanks for bearing with me..;)

..(If you did...:)..in any case).....        

Monday, August 13, 2012

मुम्बई....

सूरज को देखे बिना
रात के चाँद को ताके बिना
सडको पर अंधाधुन्द भागता शहर !

कभी जुहू की रेत पर
कभी गेट-वे  पर
सुकून की साँसे लेता शहर !

लोकल की पटरियों पर
हाई-वे के फलायोवर पर
बेचैन-परेशान शहर !

अरमानो का पुलिंदा लिए
बेस्ट की कतारों में
पसीने पोछता शहर!

थकना मांदना भूलकर
सपनो की रिक्शा के लिए
चिल्लाता शहर !

थोड़े से आराम को
अपनी एक पहचान को
तरसता शहर !

मुम्बईकरो की मुम्बईगिरी से बना
कलाकारों की हस्ती से सजा
कुछ-कुछ ऐसा ही हैं ये शहर!

Saturday, June 9, 2012

The feeling of "You".....

You were with me..and I was with you....
You held my hands...I felt the touch..warmth ...I could never define....
so joyful was I...soo lovable were you....
You got me closer...to your heart and to your soul...
the breaths were so clear...
Cool breeze and drizzy rain accompanying us....
It was so beautiful and...blissful.....
It was just You and I...
and no else on this whole Earth....
You got me closer...and nearer.....
that moment was so divine....
.
.
But....
The reality is so harshhh.....
there is no You and I....
Just I...I...and only I...
and hundreds around "I"....
and the divinity is lost......the bliss is gone...

Monday, May 21, 2012

बचपन

शांत, कोमल, नाज़ुक बचपन 
प्यारी-प्यारी यादों से सजा बचपन !
बडप्पन की ऊँगली थामे 
धीरे-धीरे कदम बढाता बचपन !
माँ की प्यारी लोरियों में 
मासूमियत की नींद लेता बचपन !
खिलौनों, गुड्डे-गुड़ियों की दुनिया मैं 
हसता-खेलता, शैतानियों भरा बचपन!

अपने घर पर तो ऐसा ही देखा था बचपन 
सड़क के पार लगता हैं, कुछ बदला-बदला सा बचपन!

ईंट-फावड़ा सर पर लादे 
मेहनतकश हैं वहाँ का बचपन!
खिलौनों की दुनिया से बहुत दूर,
पसीना बहाता, कठोर-सा बचपन!
 पास-ही के चौराहे पर मिलेगा 
चाय-पानी पिलाता बचपन!

सड़क के दो किनारों पर जी रहा ....
दो अलग-अलग जहानों सा बचपन  
 

Monday, May 14, 2012

बचपन पर कालिख: बाल श्रम

*छोटू: उम्र-8 साल; पढाई-नहीं; काम-मोहन शेठ के यहाँ नौकर; क्यों-कमाई 
*मोंटी: उम्र-9 साल; पढाई- छोड दी; काम-कारीगर; क्यों - माँ ने भेजा 
*सपना : उम्र-9 साल; पढाई- नहीं ; काम-घरेलु नौकर ; क्यों - माँ की जगह काम पर  
*सोनू:  उम्र-7 साल; पढाई- नहीं; काम-नाके पर भीख मांगना ; क्यों - बदले एक वक़्त का खाना  
*सन्नी:  उम्र-11 साल; पढाई नहीं; काम-होटल में बर्तन साफ़ करना; क्यों-घर में अकेला कमाने वाला 

हम नाम लेते जायेंगे और सूचि बढती जाएगी। ये  छोटे कंधे  जीवन और जिम्मेदारियों का कितना बोझ सहन कर सकते  हैं  और इनका मासूम बचपन कब तक हालातों की भेट चढ़ता रहेगा! आज जिन बच्चो के हाथो में खिलौनों की जगह चाय-पानी के ग्लास, झूठे बर्तन और बारूद हैं...आखिर  इन  सबके  पीछे दोषी कौन हैं ! पहले जानते हैं एक छोटी सी कहानी-
8 साल का छोटू, अपने  परिवार का अकेला बेटा... कुछ समय  पहले उसका भी एक अच्छा-बड़ा परिवार था। माँ-बाप  मजदूरी  करते थे, 2 बड़ी बहने थी, 1-1 साल बड़ी और  घर में  दादी  भी थी। एक दिन वहाँ एक हादसा हो गया जहां  उसके माता-पिता मजदूरी  करते थे, पिता की मौत हो गई और माँ बिस्तर पर पहुच  गई। दो में से एक लड़की को कोई भगा ले गया। ऐसे में माँ, बहन , और  बूढी दादी  की ज़िम्मेदारी  अकेले छोटू पर आ  गई  और वो मोहन  शेठ  के  यहाँ  काम पर लग गया।

बचपन, जीवन का सबसे अनमोल समय। बारिश की पहली बूँद-सा, मखमली पंखुरियों-सा कोमल और  निरागस होता हैं बचपन। सीखने की सही  उम्र  भी यही होती हैं। वो उस कच्ची मिटटी के समान हैं, जिसे  कुम्हार मनचाहा आकर देता हैं। परिवार और समाज के  संस्कार और सभ्यता ही व्यक्ति का निर्माण करते हैं, यानी की, उसके  व्यक्तित्व को आकर देते हैं। ऐसे में  हमारे समाज का  निचला तबका, जो पेट की आग को बुझाने के लिए दिन-रात घिसता रहता हैं। इस समाज के बच्चे परिवार के संघर्ष में उनके  साथ जुड़  जाते हैं... या जोड़ लिए जाते हैं। गरीबी के दलदल  में  फसे देश के हजारो-लाखो परिवारों की यही कहानी हैं। इन  परिवारों  में 5 साल के छोटे बच्चे से लेकर 60 साल  के  बूढ़े  तक सभी काम पर जाते हैं। लेकिन  काम  कर रहे ये बच्चे, कितना कुछ खो देते हैं, इस  बात पर किसी  का ध्यान  नहीं जाता...ख़ास कर उनके  खुद के  परिवारजनों का...कारण तो कई होते हैं: कमाई, घर की ज़िम्मेदारी, रहने के लिए छ्त मिलना, आदि.. .पर इन सभी को पूरा करते-करते मिटता तो बचपन ही हैं। 
हम अगर अपने आसपास ही नज़र दौड़ाएंगे तो हमें कई नन्हे हाथ होटलों, कैंटीन, और ढाबों पर चाय पानी पिलाते, या बर्तन  मांजते मिल जायेंगे। देश के महत्वपूर्ण छोटे उद्योगों में शामिल कांच, बीड़ी, और पटाखा फेक्टरियो में  बड़ी संख्या में बाल मजदूर पाए जाते हैं। ऐसे सभी बच्चो की जिंदगियां इन कारखानों से निकलने  वाले धूए  और हानिकारक तत्वों के कारण काली पड़  रही हैं।
भारत सरकार ने इस बुराई को मिटाने के लिए वर्ष 1986 में बाल श्रम अधिनियम बनाया था, जिसके अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चो को काम पर रखना पूर्णतः वर्जित हैं। इस गंभीर मुद्दे की विडम्बना यह हैं की, परिवारजनों द्वारा नियोजित बच्चे बाल श्रमिक नहीं कहलाते। 2001 की जनगणना के अनुसार देश भर में  12666377 बच्चे कार्यशील पाए गए।

पटाखा फेक्टरियो में जहां बारूद फटने और कारीगरों के हाथ-पाँव जलने का डर लगा रहता हैं वही बीडी  कारखानों  में काम कर रहे लोगो को सांस की तकलीफ होने का खतरा होता हैं...उत्तर प्रदेश के  फिरोजाबाद  में चूडिया बनाने का काम पारिवारिक परंपरा की तरह हैं। लेकिन कांच की भट्टी की तेज़ रौशनी और अधिक तापमान में लगातार करने के कारण आखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती हैं। इतना खतरा  होने के बावजूद बच्चे इन कारखानों में आज भी काम कर रहे हैं...सिर्फ चंद ज़िम्मेदारियो के लिए।
आकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश की कुल कामकाजी जनसँख्या  का 6.51 प्रतिशत हिस्सा 14 से कम आयु के  बच्चे हैं। प्रदेश सरकार की माने तो बाल श्रम प्रथा की समाप्ति तथा बाल श्रमिको का पुनर्वास, श्रम विभाग के  प्राथमिकता के विषयो में सम्मिलित हैं।10 अक्टोबर 2006 को केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित उपजिविकाओ  की सूचि में होटल, ढाबों, रेस्टोरेंट, चाय की दुकानों, तथा घरेलु कार्यो आदि में बाल श्रमिको का नियोजन  प्रतिबंधित किया गया था। राज्य के चुनिन्दा जिलो में बाल श्रमिको के पुनर्निवास के लिए भारत सरकार "राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना " क्रियान्वित कर रही हैं। इस परियोजना के अंतर्गत चुने गए जिलो में बाल श्रमिको का सर्वेक्षण कर उन्हें खतरनाक किस्म के व्यवसायों/प्रक्रियाओं से विमुक्त कराकर विशेष विद्यालयों में भर्ती किया जाता हैं।  इन विद्यालयों में सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण की भी व्यवस्था अपेक्षित हैं, तथा दर्ज बच्चो को सौ रुपये मासिक छात्रवृत्ति, पाठ्य पुस्तके, युनिफोर्म, तथा माध्यान्ह भोजन दिए जाने के  अतिरिक्त नियमित स्वास्थ्य प्रशिक्षण का प्रावधान हैं।
लेकिन सरकारी आकडे और योजनायें एक तरफ और सच्चाई एक तरफ होती हैं। बस-टैम्पो में कन्डक्टरी  करता छुटकु हो या, घर में कमला बाई की जगह काम पर आई उसकी बेटी पिंकी हो...परिवार को अपना छोटा  किन्तु महत्वपूर्ण योगदान देते ये बच्चे हमारे आसपास ही हैं। 
इनमे भी सबसे  दयनीय स्तिथी में वे बच्चे हैं जिनके माँ-बाप नहीं हैं, जिनका न तो खुद का परिवार हैं, न तो  रहने के लिए घर। कुछ लोग इनकी खरीद-फरोख्त करते हैं, चौराहों पर भीख मंगवाते हैं और बदले में एक समय का खाना देते हैं। बड़े शहरों में इस समस्या ने एक भयानक रूप धारण कर लिया हैं, जहां भीख के पैसे न देने पर बच्चों का शारीरिक शोषण किया जाता हैं...उन्के साथ मारपीट कर गहरी चोट  पहुचाई जाती हैं। पिछले दिनों एक ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के इंदौर में सामने आई हैं।

जिस तरह का घिनौना समाज हमारे आसपास पनप रहा हैं...उसमे संत्रास हैं, शोषण हैं और गिरते सामाजिक-मानवीय मूल्य हैं। सरकारें आती हैं, नये नीयम बनाती हैं...लेकिन स्तिथी जस-कि-तस हैं। सर्व शिक्षा  अभियान, माध्यान्ह भोजन जैसी कोशिशे, हालातों के सामने बौनी नज़र आती  हैं। गरीबी, भुखमरी,बाल श्रम, बेरोजगारी, महंगाई जैसी समस्याएँ एक दुसरे से जुडी हुई हैं, एक को ख़तम करने के लिए दूसरे का हल ढूंढना ज़रूरी हैं। समस्या हमारी, हल भी हमें ही खोजने होंगे ...