आदत प्याले की लग जाती
तो हालत बुरी हो जाती!
उससे से तो बच गया
तुझसे बचने को कहाँ भागु ?
प्याले तो छूट गए, तेरी आदत लगा गए
मैं अपनी आदतों से दूर कहाँ भागु?
दुनिया तुझमे सिमटी हैं अपनी
अपनी दुनिया से दूर कहाँ भागु ?
अब किसी रंगीन पानी की क्या ज़रूरत
तेरी आदते काफी हैं
तू ही मेरी रंगीनियत और हया हैं
ये रंगीनियत और हया छोड़ मैं कहाँ भागु ?
बता, मैं तुझसे दूर कहाँ भागु ?
My Words..My thoughts...
“Many people hear voices when no one is there. Some of them are called mad and are shut up in rooms where they stare at the walls all day. Others are called writers and they do pretty much the same thing.” —Margaret Chittenden
Thursday, May 16, 2013
Monday, May 13, 2013
माँ ...
तेरे आँचल में
ना धूप लगती थी, ना बरिशे !
जब से बाहर आया हूँ
छाँव ढूंढ़ रहा हूँ !
अंधेरो के सायो से
अब डर नहीं लगता
आसुओ को सुखाने में
रात बीत जाती हैं
साए मचलते रहते हैं
और आँख लग जाती हैं !
Thursday, May 9, 2013
कामयाबी, तेरा शहर...
जाने किन गलियों से चला था मैं
और, किस शहर को आ गया
मंजिले पाने की धुन में
रास्तो में उलझ गया
उलझनों से फिर रस्ते बुनकर
देखो, किस मुकाम पर पहुँच गया!
ऊंचाइयों पर रहना सीख गया
महफ़िलो में, कभी अकेले में
विदेशी हया पीना सीख गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं क्या-क्या सीख गया !
आज ज़िन्दगी आलिशान हैं
बंगले में बैठा हूँ
बाहर बागीचा-बाघबान हैं
'कामियाबी' तेरे शहर में
देख, आज मेरी क्या शान हैं !
झूठी मुस्काने लिए फिरता हूँ
कभी अश्कों को दबाये रहता हूँ
सच्चे-झूठे अफ़साने लिख-लिख कर
अपनी शोहरत बढ़ाता हूँ
दोस्त-दोस्त में फरक समझता हूँ
'कामयाबी' तेरे शहर में
देख, मैं कैसे-कैसे दिन बिताता हूँ
'कामयाबी' तेरे शहर में,
वक़्त हैं कही खो गया
वक़्त के साथ दौड़ लगाते
मैं भी कही गुम गया
वक़्त का रोना रोते-रोते
इक अरसा तक बीत गया!
रोज़ आईने पर इतराता था जो ...
'कामयाबी' तेरे शहर में आकर,
वो अक्स मुझसे टूट गया !
तुम अपनी शक्ल की बात करते हो
हुज़ूर,
ये शख्स तो अपनी सूरत तक हैं भूल गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं कितना कुछ भूल गया !!!
और, किस शहर को आ गया
मंजिले पाने की धुन में
रास्तो में उलझ गया
उलझनों से फिर रस्ते बुनकर
देखो, किस मुकाम पर पहुँच गया!
ऊंचाइयों पर रहना सीख गया
महफ़िलो में, कभी अकेले में
विदेशी हया पीना सीख गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं क्या-क्या सीख गया !
आज ज़िन्दगी आलिशान हैं
बंगले में बैठा हूँ
बाहर बागीचा-बाघबान हैं
'कामियाबी' तेरे शहर में
देख, आज मेरी क्या शान हैं !
झूठी मुस्काने लिए फिरता हूँ
कभी अश्कों को दबाये रहता हूँ
सच्चे-झूठे अफ़साने लिख-लिख कर
अपनी शोहरत बढ़ाता हूँ
दोस्त-दोस्त में फरक समझता हूँ
'कामयाबी' तेरे शहर में
देख, मैं कैसे-कैसे दिन बिताता हूँ
'कामयाबी' तेरे शहर में,
वक़्त हैं कही खो गया
वक़्त के साथ दौड़ लगाते
मैं भी कही गुम गया
वक़्त का रोना रोते-रोते
इक अरसा तक बीत गया!
रोज़ आईने पर इतराता था जो ...
'कामयाबी' तेरे शहर में आकर,
वो अक्स मुझसे टूट गया !
तुम अपनी शक्ल की बात करते हो
हुज़ूर,
ये शख्स तो अपनी सूरत तक हैं भूल गया
'कामयाबी' तेरे शहर आकर
देख, मैं कितना कुछ भूल गया !!!
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Friday, May 3, 2013
100 years
100 years of a magnificent magic on screen
100 years of rolling cameras
100 years of glittering lights
100 years of action
100 years of dreaming minds
100 years of creativity
100 years of struggle
100 years of glamor
100 years of romance
100 years of emotions
100 years of relations
100 years of change
100 years of melody of playback
100 years of lurking aspirations
100 years of celluloid
100 years of glory
100 years of path breaking cinema
100 years of Indian Cinema...
May 3rd 2013 is marking the completion of 100 years of Indian Cinema, the biggest Industry throughout the world. This Industry is no doubt a source of inspiration and dreaming big for thousands around the Indian sub-continent.
Saluting the spirit of Indian Cinema... the spirit of everyone who is a part of this ever growing Industry.
100 years of rolling cameras
100 years of glittering lights
100 years of action
100 years of dreaming minds
100 years of creativity
100 years of struggle
100 years of glamor
100 years of romance
100 years of emotions
100 years of relations
100 years of change
100 years of melody of playback
100 years of lurking aspirations
100 years of celluloid
100 years of glory
100 years of path breaking cinema
100 years of Indian Cinema...
May 3rd 2013 is marking the completion of 100 years of Indian Cinema, the biggest Industry throughout the world. This Industry is no doubt a source of inspiration and dreaming big for thousands around the Indian sub-continent.
Saluting the spirit of Indian Cinema... the spirit of everyone who is a part of this ever growing Industry.
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Cinema,
Indian Cinema
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Wednesday, April 24, 2013
आज के रावण
बरसो से रावण के पुतले को
पटाखों से फोड़ते आये हैं
पटाखों से फोड़ते आये हैं
रावण का क्रोध, पुतले पर उतार
सदियों से दशहरा मनाते आये हैं !
सदियों से दशहरा मनाते आये हैं !
तब अयोध्या की साख की
आज कोई और कहानी हैं
आज कोई और कहानी हैं
गुस्से की आग में
पुतले फूकने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !
पुतले फूकने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !
माँ-बहन का नाम दिया
जिस नारी को
देवी की मूरत में पूजा किये
जिस नारी को
जिस नारी को
देवी की मूरत में पूजा किये
जिस नारी को
अपवित्र कर दिया आँचल
उस नारी का
आबरू-बेआबरू कर सर झुकाया
उस नारी का
उस नारी का
आबरू-बेआबरू कर सर झुकाया
उस नारी का
अरमानो को उसके झकझोड़ दिया
ऐ मर्द ,
ऐ मर्द ,
ममता भरा सीना उसका
जब तूने नोच दिया !
जब तूने नोच दिया !
कलियुग की बिसाख पर
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं
बेशर्मो की मिसाल,
एक हमारी राजधानी हैं
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं
बेशर्मो की मिसाल,
एक हमारी राजधानी हैं
भभकती आग में
रोष जताने की,
चित-चित जलती चिंगारियों से,
उद्घोष अपना सुनाने की
अत्याचारियों का पुतला जलाने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !
रोष जताने की,
चित-चित जलती चिंगारियों से,
उद्घोष अपना सुनाने की
अत्याचारियों का पुतला जलाने की
प्रथा बड़ी पुरानी हैं !
कलियुग की बिसाख पर
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं!
रची जा रही
रोज़ शर्म की नयी कहानी हैं!
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Monday, April 15, 2013
इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में अब भी ताज़ा हैं
तेरे लब से निकली हर बात !
इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में तरो ताज़ा हैं
अपनी तकरारे, बेवक़्त बेबात !
इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में आज भी चुभता हैं
तेरा पलटना और वापस न आना!
तेरी आमद के इंतज़ार में
अश्क कितने बहा दिए
तेरे अफ़साने लिख-लिख कर
अदीबो ने,
लफ्ज़ कितने गंवा दिए!
बावजूद इसके...
महज़ अशरार न कहना इन्हें
मेरे लफ्ज़ जो गुमसुम हो जाएंगे
जिस कलम से उतर रहे हैं,
उसी स्याही में सूख जाएंगे !
जिन जज्बातों को उकेरने बैठी हूँ ,
वो मुझसे खफा हो जाएंगे !
हबीब बन मेरे साथ थे जो ,
वही, मेरे रकीब बन जाएंगे !
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में अब भी ताज़ा हैं
तेरे लब से निकली हर बात !
इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में तरो ताज़ा हैं
अपनी तकरारे, बेवक़्त बेबात !
इक हसीं इत्तेफ़ाक सी
वो पहली मुलाकात
ज़ेहन में आज भी चुभता हैं
तेरा पलटना और वापस न आना!
तेरी आमद के इंतज़ार में
अश्क कितने बहा दिए
तेरे अफ़साने लिख-लिख कर
अदीबो ने,
लफ्ज़ कितने गंवा दिए!
बावजूद इसके...
महज़ अशरार न कहना इन्हें
मेरे लफ्ज़ जो गुमसुम हो जाएंगे
जिस कलम से उतर रहे हैं,
उसी स्याही में सूख जाएंगे !
जिन जज्बातों को उकेरने बैठी हूँ ,
वो मुझसे खफा हो जाएंगे !
हबीब बन मेरे साथ थे जो ,
वही, मेरे रकीब बन जाएंगे !
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